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Hindi Essay on "Indira Gandhi Biography", "इन्दिरा गाँधी जीवनी " for Students Complete Hindi Speech, Paragraph for class 5, 6, 7, 8, 9, 10 students in Hindi Language.

इन्दिरा गाँधी जीवनी 
Indira Gandhi Biography


जिस देश की नारी श्रावणी पूर्णिमा के शुभ दिन अपने भाई के हाथ में राखी बाँधकर अपनी रक्षा के लिए आश्वस्त हो जाती है, हर क्षण जो पति को भगवान मानकर पूजन के पुष्प अर्पित करती है, उसी देश की सेवापरायणा नारी शासन-सूत्र सँभालकर करोड़ों नर-नारियों को अभयदान दे सकती है-इसका ज्वलन्त उदाहरण है। श्रीमती इन्दिरा गाँधी।

एक सुखद आश्चर्य की बात है कि जिस 19 नवम्बर को रूस में जारशाही के, विरुद्ध जनक्रान्ति का तूर्य बजा, उसी दिन 1917 ई0 में तीर्थराज प्रयाग के राजनीतिक तीर्थस्थल 'आनन्द भवन' में इन्दिराजी का जन्म हुआ। इन्दिराजी को बड़े बाप के एकलौते बेटे की लाडली होने का सौभाग्य प्राप्त हआ। जन्म की घडी से ही ये राजनीतिक बयार में पलीं, इनका राष्ट्रप्रेमी व्यक्तित्व निर्मित हआ। जब ये तीन साल की थीं, तब ऊँची मेज पर खड़ी होकर नौकरों के बीच जोर-जोर से भाषण देती थीं।

इन्दिराजी का सक्रिय राजनीतिक जीवन बारह वर्ष की अवस्था से आरम्भ हो जाता है। 1929-30 ई0 में जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन का बिगुल फूंका था, तो इन्दिराजी ने अपनी उम्र के बच्चों का एक दल बनाया। इसका नाम था 'वानर-सेना'। 'वानर-सेना' राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सन्देश एक-दूसरे के पास पहुँचाती थी। इन्दिराजी के मोहक एवं कर्मठ व्यक्तित्व के कारण इसकी संख्या दसगुनी हो गयी।

इन्दिराजी की पढ़ाई का श्रीगणेश पूना के गुजराती विद्यालय में हुआ। फिर ये शान्तिनिकेतन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सम्पर्क में आयीं। उसके बाद ये अध्ययन के लिए खिट्जरलैण्ड गयीं, किन्तु क्रमबद्ध रूप से इनकी विश्वविद्यालयीय शिक्षा नहीं हुई। ये पंडित जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, श्रीमती । सरोजिनी नायडू इत्यादि के प्रत्यक्ष सम्पर्क के महाविद्यालय में ही शिक्षा-दीक्षा लेती रहीं। जिस परिवार की धुरी पर सम्पूर्ण भारतीय राजनीति ही चक्कर काटती रही, उस परिवार में जन्म लेने के कारण विरासत में ही क्रियात्मक जान की इन्हें अलभ्य निधि मिल गयी।

इन्दिराजी इतने समृद्ध परिवार में उत्पन्न हुई थी कि ये ना समय रगलियों मे अच्छी तरह बिता सकती थी। किन्तु जब भारतमाता विदेशियों के अत्याचार के कारण कराह रही हो, तो उसकी बेटी मौज-मजे में दिन क्यों काटे? दुर्गाबाई और लक्ष्मीबाई की परम्परा की कड़ी क्या टूट सकती थी? नहीं, कदापि नहीं। इन्दिराजी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पडी। महज 22 वर्ष की इनकी अवस्था थी, जब 1939 ई. में पहली बार तेरह महीने के लिए इन्हें जेल की सजा दी गयी।

26 मार्च, 1942 ई0 के दिन इनका विवाह फिरोज गाँधी के साथ हुआ। किन्तु कुछ ही महीने बाद अगस्त में 'अँगरेजो, भारत छोड़ो' का आन्दोलन चला। अभी ये विवाह की गुडिया-बहू ही थीं कि फिर कारागृह की कालकोठरी में बन्द कर दी गयीं। इन्होंने देश को स्वतंत्र करने के लिए अपने वैयक्तिक सुखों का होलिका दहन किया और इनका सोने-सा तन राष्ट्रसेवा की आग में कुन्दन बनता रहा।

भारत की आकांक्षाओं के मंगलदीप पं0 जवाहरलाल नेहरू की लौ को चिरकाल तक बुझनने के लिए ये स्वयं स्नेह बन ढलती रहीं। पंडितजी ने बहुत निश्चिन्त होकर राष्ट्राहत के लिए जो किया, उसकी आधारभूमि थीं इन्दिराजी ही। इन्दिराजी पडितजी के साथ विश्वभ्रमण में जाती रहीं; उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान तो रखती थी ही, साथ ही-साथ संसार के राजनीतिक घटनाचक्र को भी ठीक ढंग से समझने की चेष्टा करती थीं।

1959 ई0 मे इन्दिराजी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक संस्था कांग्रेस की अध्यक्षा निर्वाचित हुई। 1964 ई0 में जब पं. जवाहरलाल का निधन हुआ, तो ये श्री लालबहादुर शास्त्री के अनुरोध पर सूचना तथा प्रसारण मंत्री बनीं। देशवासियों का मनोबल बढ़ाने तथा विश्व में भारतीय मर्यादा फिर से प्रतिष्ठित करने के लिए इनका कार्य सराहनीय रहा। जब दुर्भाग्य से 11 जनवरी, 1966 ई0 को श्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हुआ, तो 19 जनवरी, 1966 ई0 को ये सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री चुनी गयीं।

1967 ई0 के फरवरी महीने में चौथा साधारण निर्वाचन हुआ, जिसमें ये प्रधानमंत्री बनीं। इनके व्यक्तित्व का आकर्षण था कि इनकी पार्टी सत्ता कांग्रेस 1971 ई. में अजेय बहुमत से विजयी हुई और ये पुनः सर्वसम्मति से देश की प्रधानमंत्री बनायी गयीं।

अपने प्रधानमंत्रित्व काल में इन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं। जैसे-प्रमुख चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स का उन्मूलन, याह्या खाँ की बर्बरता के शिकार पूर्वी पाकिस्तान का एक नवीन स्वतंत्र राष्ट्र बँगलादेश के रूप में प्रतिष्ठापन, रूम के साथ मंत्री-स्थापन तथा पाकिस्तान को युद्ध में पराजित कर विश्व में भारत के सबल अस्तित्व का स्थापन।

काल की सीढ़ियों पर इन्दिराजी के निर्भीक चरण बड़ी दृढ़ता से बढ़ते रहे। ये श. से गरीबी के दानव को पराजित करने तथा भारतीय सम्पन्नता के सूर्योदय के स्वप्न साकार करने की हर क्षण चेष्टा करती रहीं। ये शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं गुटों के अलग रहने की नीति में आस्था रखती थीं। अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति जॉनसन की पत्नी ने इनके बारे में 1961 ई. में कहा था, "यदि भारतीय जीवन का मर्म समझना हा, तो इन्दिरा गांधी जैसी शिक्षिका का मागदर्शन प्राप्त करें।

इन्दिरा गांधी का यदि मोम-सा मुलायम तन था तो पत्था-मा अविचल पन भी। यदि ये अपने देशवासियों की पीड़ा से पिघल उठती थी तो संकटो के तूफान में अविचल भी रह सकती थीं। 1977 ई. के प्रारम्भ में ही इन्हनि लोकसभा के लिए आम-चुनाव कराने की घोषणा की और इस बार वे चुनाव हार गई। 27 मार्च, 1977 की सुबह श्रीमती गाँधी ने प्रधानमंत्री-पद से त्यागपत्र दे दिया।

जनता सरकार एवं परवर्ती लोकदल कांग्रेस सरकार के शासनकाल में उन्हें सब ओर से लांछित और उत्पीड़ित करने के प्रयास हुए। लेकिन वे अपने दृढ़ निश्चय और प्रबल इच्छाशक्ति के सहारे जनमत को अपने अनुकूल बनाती रहीं। फलतः 1980 का प्रथम मप्ताह उनकी सेवा में एक बार फिर भारत के प्रधानमंत्रित्व का पद लेकर उपस्थित हुआ। चौंतीस महीने के बाद 14 जनवरी, 1980 को श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्रि पद पर आरूढ़ हुई। इस बार लोकसभा की कुल 541 सदस्य-सूची में श्रीमती गाँधी के दल को 351 स्थान प्राप्त हुए। इस प्रचण्ड बहुमत के साथ श्रीमती गाँधी ने भारत के सर्वांगीण विकास का कार्य नए सिरे से प्रारम्भ किया।

उन्होंने 1982 ई0 में एशियाड का आयोजन दिल्ली में कराया। ने 102 गुट-निरपेक्ष देशों की अध्यक्ष बनीं।

31 अक्टूबर, 1984 ई0 के प्रातःकाल का 9 बजकर 30 मिनट। मानवता के इतिहास का एक सबसे काला पात्र । उस दिन भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी। के दो अंगरक्षकों ने उनके आवास पर ही उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। उन्होंने । अपने शरीर की अंतिम बूंद दे डाली, पर भारत की अखंडता को खंडित नहीं होने | दिया। वे मर कर भी अमर हैं। उनके आदर्श भारत का ही नहीं, बल्कि संसार का मार्ग-दर्शन करते रहेंगे।



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