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Hindi Essay on "Kachakach Bhari Gali me Sham ki Sair","कचाकच भरी गली में शाम की सैर " for Students Complete Hindi Speech, Paragraph

कचाकच भरी गली में शाम की सैर 
Kachakach Bhari Gali me Sham ki Sair


जीवन नाना प्रकार की अभूतपूर्व अनुभूतियों का सम्मिश्रण है। अनोखी अनुभूतियों में एक है शाम के समय कचाकच भरी गली में भीडभाड के बीच से पैदल चलना । भीड में से होकर गुजरना स्वयं एक अजीब अनुभूति है । अतः शाम के समय भीडभाड के बीच से गुजरना प्रायः बेजोड अनुभूतियों का भण्डार है। शाम के समय कचाकच भरी गली या सड़क की स्थिति कैसे हो सकती हैं, कोई इसकी कलपना भी नहीं कर सकता है । स्कूल या कालिज के छूटने का वही समय है । विभिन्न कार्यालयों के बन्द होने का भी वही समय है । गली या सड़क स्कूल छोड़नेवाले बच्चों और कालिज से आनेवाले छात्र और छात्रओं से भर जाती हैं और उनकी धक्का मुक्की होती है। बस या ट्रेन पकड़ने की जल्दबाजी में एक दूसरे का धक्के देते हुए चलते हैं या बस की इंतज़ारी में बड़ी देर तक खडे रहना बेकर समझकर घर की ओर पैदल चलनेवालों की भीड़ की परवाह न करके आजा रही हैं । ऐसे लोगों के बीच से हम गुजरें तो हमें विभिन्न प्रकार के दृश्यों का सामना करना पड़ता है। एक ओर फेरीवालें, अपने लक्ष्य की ओर जाने की जल्दी में भागती भीड़ का ध्यान आकृष्ट करने के लिए अपनी माल की बिक्री के लिए शोरगुल करते दीखते हैं । पुलीस भी इस भीड को सुव्यवस्थित करने की कोशिश करती है। सारा वातावरण हर तरह के शोर गुल से प्रदूषित हो जाता है । यह एक आश्चर्य की बात है कि इतने सारे शोर गुल होते हुए भी, इन शोर गुल के बीच रहते हुए भी शहर के निवासी बहरे नहीं हुए हैं।


कभी कभी अंधाधुन्ध भागती भीड में हमारे पांव दूसरे के पावों के नीचे कुचले जानेपर हमें उनपर गुस्सा करने पड़ते हैं, आँखें दिखाने पड़ते हैं । ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो कचाकच भरी बसों या भीड में राहगीरों को बेखबर पाकर उनसे पिकपाकेट करने पर तुले हुए हों। ऐसे गेलाटों की कमी भी नहीं जो अपनी रोमांचकारिता दिखाने की ताक में हों। ऐसी ताबड़तोड़ भारी भीड से होकर थोडी दूर गजरने पर हमारी पोशाक और हेरस्टाइल को देखों तो समझने लगेंगे कि जितना समय और पिरिश्रम हमने कपडे सुचारु ढंग से पहनने या कंधी करने में लगाये वे सब बेकार हैं ।और मालूम होगा कि हमारे कपडे पसीने से लथपथ किसी चिथडे की गठरी सी लगने लगते हैं। अगर हमारे शरीर पर कपडे हूब ब हू रहते तो धनीमत


इन सब के होते हुए भी भीड में चलना कोई बुरा अनुभवनहीं । अगर हम भीड में कान और आँखें खोलकर चलें तो हमें बहुत मजेदार वार्ताओं से पेश आने का और अजीब वार्तालाप सुनने का मौका मिलेगा। यह आश्चर्य की बात नहीं होगी कि इस दौरान इन आम राहगीरों में गहरे और गंभीर विषयों की बात चीत या बहस सुनें या खास मामलों पर खण्डन या मण्डन करते सुनें । इस तरह, तरह तरह के लोगों से पेश आना मनोवैज्ञानिक तत्वों के अध्ययन के लिए अमूल्य अवसर प्रस्तुत करते हैं । संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि शाम के समय कचाकच भरी गली में पैदल चलना स्वयं एक अनोखी अनुभूति है।



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