चौतरा 
Chetra



मित दुःखुड़ सब तै सुणाँदू रै ग्यों । 

दिल खोलिक सब तै बताँदू रै ग्यों । 

पत्थर दिल हवे ग्याई अब त या दुनिया तेरी।

उ पीठ दिखाँद, अर मी बुलाँदू रै ग्यों ।।1।। 


पसीना कू जगा मीन खून बगाई। 

लेखि-लेखिक कलमकि स्याही सुखाई। 

सर्रा उमर मी ऊँ कुण र्वांदू रै ग्यों। 

फिर भि उ कभि अपुर्णां नि ह्वाई ।।2।।


अपणी किस्मत अफ़िगि नि पवाड़ी मीन । 

अफ़िगि नि बणाई जाति ‘ग्वाड़ो' मोन । 

यु दुर्भाग्य भि दुनियन द्याई मीत । 

अफ़िगि नि ब्वालि अफ कुण 'कबाड़ी' मीन ।।3।। 


हर आदिम कैक न कैक करतूतन उब्यू छ । 

दिन-रात उ अपणी चिता मा ड्व्य छ। 

इन' मा क्वी के तै क्य सहारू द्यालू । 

हर आदिम वेकी लोगुरु लुट्यू छ ।।4।। 


ईर्सा-घणा की दिवार मी तोड़ी चूल । 

हवा कू हर उल्टू रुख मोड़ी द्यूल।

दुस्टता से दिल जु तुड़िन तीन । 

हर टुट्यू दिल मी जोड़ी चूल ।।5।। 


सर्रा जिंदगी यी रुठी किस्मत मनांदू रै ग्यों। 

सब तै कथा-व्यथा अपणी सूणाँदू रै ग्यों। 

क्य-क्य छवीं लगाण त्वे मा। 

अपणूक बीच भि अपछाणू रै ग्यों ।।6।।